नादान परिंदा
नादान परिंदा
उड़ना चाहता था
घोसला छोड़ कर
माँ उसे डरा देती थी
कमजोर पंखो का
उल्हाना देकर |
पर वह जिज्ञासु जब भी
घोसले से बाहर देखता
में भी उडू ,में भी उडू
माँ से पूछता फिरता
तू छोटा है ,नादान है
माँ उसे समझाती
पर उस जिज्ञासु को
माँ की बात
समझ में नही आती|
इस डाल से उस डाल उड़ता
जब जब भी माँ
दाना लेने जाती
उड़कर बहुत खुश होता
पर माँ से झूठ बोलने वाली
बात नहीं सुहाती
साथी परिंदों को उड़ता देख
खुद को रोक न पाया
और फिर वह भी
घोसले से बहार
निकल आया
पंख फडफडाये
उड़ान भरी और उड़ने लगा
उंचा ऊंचा और ऊंचा
आकाश की और
पलटकर नहीं देखा
उसने घोसले की और
पर माँ अभी भी देख रही थी
उसे घोंसले से उसे
आखिर माँ है
दिल में डर था
उसके गिरने का
---- गोगी -------

पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...
ReplyDeleteइस रचना के लिए बधाई स्वीकारें.
नीरज
thank you bhai sa .
ReplyDeleteसुन्दर अभीव्यक्ति
ReplyDelete