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Thursday, 21 August 2025

जीवन मरु

 
बीत गया
दिन सारा
इस मरु को
पार करते करते
थका हूँ,नही हारा
आश्वस्त हूँ
की थम गये है
लू के थपेड़े
दिखा है
एक शीतल शाद्वल
सांझ ढलते ढलते

आंधी तुफानों से
सौगात में मिले
रेत कण
जो किरकरा रहें है
आखों में
दिन भर से
धो लूंगा शाद्वल के
शीतल जल से

अब सो सकूँगा
प्रगाढ़ निंद्रा में
इस मरु की
शांत शीतल
रात में
दिन तो सारा

बीत गया
इस मरु को
पार करते करते

अभय असि

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