सिसकते शब्द
Friday, 22 May 2026
दूर क्षितिज पर
दूर क्षितिज पर
जब ठहरती है नज़र
तो उठती है
मन में एक लहर
चंद प्रश्नों की
सुनामी बनकर।
मेरे बाद आने वाले
क्या देख पाएंगे
ये मंजर?
देख पाएंगे?
सागर के आँगन में
बालू का बिछौना
नील गगन में
बादलों से बना
ये खिलौना?
नदी की लहरों पर
हिरणी सी फुदकती
ये नन्ही सी नाव?
निहार सकेंगे वो भी
जो मैं निहार रहा हूँ
यही सोच-सोच मैं
अपने पद-चिह्न
छोड़े जा रहा हूँ।
क्या चल सकेंगे वो
मेरे बनाए पद-मार्गों पर?
क्या बचा पाएंगे वो
जल, जमीं और जंगल?
या कहीं विकास की सड़कों पर
दौड़ते मिटा देंगे
पुरखों की बनाई
ये पगडंडियाँ?
यही सोच खड़ा रह जाता हूँ
एक प्रश्न-चिह्न बनकर।
— Asi
दादी
दादी
अब तू
हाथ जला
टिक्कड़ थेप
नही
आयेगा
तेरा हमीद
चिमटा लेकर
तू राह मत देख
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
हो गया है
वो गुमराह
जेहादी मेले में
चिमटे की जगह
पड़ गया वो
ए के फोरटी सेवन
के झमेले में
,,,,,,,,,,,,,,,,,,
दादी तू
बस अब
हाथ जला
ओर टिक्कड़ थेप
हमीद की राह
मत देख. .....
........असि .
मै गुरु हूँ पर द्रोण
मै गुरु हूँ पर द्रोण नहीं कि........................
अंगूठा कटवा लूँ
गुरु दक्षिणा में
किसी भील बालक का
मै जानता हूँ
भील के अंगूठे की अहमियत |
मै गुरु हूँ पर द्रोण नहीं कि......................
उपेक्षा करूँ
किसी प्रतिभा की
मै जानता हूँ
उपेक्षित प्रतिभाओ
को मिला लेता है दुश्मन
अपने खेमे में ,देकर अच्छी कीमत |
मै गुरु हूँ पर द्रोण नहीं कि.........................
अपनी आँखें मूंद लूँ
जब बहु-बेटी
कि जा रही हो निर्वस्त्र
मै जानता हूँ
क्या होती है ,बहु -बेटी की अस्मत |
'असि'
भारी बस्तों के बंधन में
बांधो मत उन्हें भारी बस्तों के बंधन में ll
जानें ? के क्या चलता है उनके मन में ll
जैसे भी वो बतियाते हैं बतियाने दो ||
उनकी ही भाषा में उन्हें तुतलाने दो ||
मत डालो उन्हें भाषाई उलझन में ||
जानें ?के क्या चलता है, उनके मन में ll
कहने दो गर कहते हैं ,मून को मामा ||
मत पहनाओं अपने ज्ञान का जामा ||
एक दिन तारे होंगे वे नील गगन में ll
जानें? के क्या चलता है उनके मन में ll
खेलकूद की उम्र है यह अभी उनकी ll
मत सिखाओ उन्हें ये पहाड़े -गिनती ll
सितोलिया के सात अंक है जेहन में ll
जानें ?के क्या चलता है उनके मन में ll
ना डालों नन्है कानों मे तुम क्लोरोफील
पौधे क्यूँ होते हैं हरे ,इसकी फील- वील
क्यूँ उलझाते हो इन्हें विज्ञान-रसायन में
जानें ?के क्या चलता है उनके मन में ll
ऑन लाईन छीन लेगा इनका आनन्द ll
ये खुद है गौतम,गांधी,और विवेकानंद ll
पाठ्यक्रम काम नहीं आयेगा जीवन में
जानें? के क्या चलता है उनके मन में ll
------ अभय असि ---
सुन्दरता से सराबोर संसार.
सुन्दरता से सराबोर है
यह संसार.
सुन्दरता को देेखो
भौर की किरण में
उछलते हिरण में
सूरज की धूप मे
वृक्षों की चुप में
पक्षियों के प्यार में
चिटियों की कतार मे
सुन्दरता को सुनो
अन्धेरी रात में
गिरती बरसात में
हवा की सरसराट में
गवैये की गुनगुनाहट में
नन्ने मुन्नों की तुतलाहट में
चिड़ियों की चहचहाट में
सुन्दरता से सराबोर है
यह संसार.
यदि हो सुन्दरता
हमारी आवाज में
हमारे हर काज में
हमारी नजर में
हमारेे विचार में
'असि'
माँ से शिकायत
----------------------
माँ !
काहे
तुम भी
सो गई थी
सुभद्रा जैसी
जब बाबा सीखा
रहे थे तुम्हे इस
जीवन कुरुक्षेत्र के
चक्रव्यूह भेदन कला
माँ
मै भी
जग की
रची इस
व्यूह रचना
में फस जाता हूँ
जैसे की अभिमन्यु
इस अधूरी विद्या से
खूब कष्ट सहे उसने
माँ
मुझे
भी देखो
अधमरा
कर रखा है
इस कुरुक्षेत्र
में असंख्य कौरवो
दू:शासनों, दुर्योधनों
और कईं शकुनियों ने
माँ
कैसे
बताऊं
अब तुम्हैं
मैं, के कितना
मुश्किल होता है
मर मर के जीना
जीवन कुरूक्षैत्र में
कौरवो,शकुनियों के बीच
....अभय'असि'
मकड़जाल
देखता हूँ
मकड़ी को
जब जाल
बुनते हुए
उसके बुने जाल में
कीट पतंगो को
फसते हूए
तब मैं
न तो कुछ सोचता हूँ
ना ही कुछ विचरता हूँ
जानता हूँ
कीट पतंगो की
इस अलौकिक
कला को
जो जरुरी है
उदार पोषण के लिए
और कर भी क्या सकते है
वो है भी तो बैचारे
बुद्धि विहीन
देखता हूँ
जब मानव को
जाल बुनते हुए
उसके बुने जाल में
मानवो को फसते हुए
तब सोचता हूँ और विचरता भी हूँ
बहुत कुछ हाँ बहुत कुछ
क्यो बुनता जाल मनुष्य
मनुष्य के लिये
नहीं सोच पाता
इस लौकिक चालाकी को
जो जरुरी नहीं मनुष्य को
उदार पोषण के लिए
और वो है भी तो नहीं
बुद्धिविहिन
सोचता हूँ बहुत कुछ
और सोचते सोचते
उलझ जाता हूँ
अपने ही विचारों के
मकड़जाल में
और हो जाता हूँ
कीट पतंगो की तरह
बुद्धिविहीन
,,,,,,अभय असि ,,
मैं संख्या और तुम शून्य
मैं संख्या
और तुम शून्य
जुड़ो जब मुझसे
तो बढ़ा देती हो
मान मेरा
बिन तुम्हारे मैं एक
जुडो तुम झुससे
तो हो जाऊं
मै दस बीस तीस चालीस
तुम शून्य अपरिमित
मान बढ़ाती रहती हो मेरा
नही जुड़ो तो
मैं संख्या और
तुम शून्य
मान तुम्हारा भी
बढ़ता है
मुझसे जुड़ने से
मैं नही तो तुम
केवल शून्य
संख्या के साथ ही
मान है तुम्हारा
संग छुटा
तो तुम केवल शून्य
कोई मान नहीं तुम्हारा
तुम सिर्फ शून्य हो संख्या बिना
-- क्योकि
सामाजिक आर्यभट्टों नें
नहीं दिया है कोई हक
किसी दुसरे
अंक में समाकर
अपना मान बढ़ाने का
----- अभय असि ----
रोटियों
वो आर्डर दे रहे थे
वेटर से पूछ रहे थे
रोटी में क्या क्या है.
वेटर बोले जा रहा था
नान रोटी
मक्का रोटी
मिस्सी रोटी
बयारु रोटी
लच्छा रोटी
मीठी रोटी
रूमाली रोटी
तंदूरी रोटी
इतनी सारी रोटियों के नाम
लगातार बोलना
वेटर के लिए भी
सवाल था रोटी का
और वही गेट पर
मासूम भूख
बोले जा रही थी
लगातार वेटर की तरह
,,,भैया
दो दिन से कुछ नहीं खाया
दे दो न
"बची खुची रोटी"
कुछ बच्चे ढूंड रहे थे
होटल से फेके गये खाने में
"फेकी हुयी रोटी")
रोटियों के
कितने भी नाम हो
पर काम एक ही होता है
भूख मिटाना
और सरकार प्रयास रत है
की आप डाउनलोड कर सको
डिजिटली रोटी
----- अभय असि
अमर घर चल
अमर घर चल
नल पर जल भर
खटपट मत कर
पढ़ाया था हमें
हमारे शिक्षक ने
हमें लगा था
सीखा रहे है
केवल पढ़ना
बिना मात्रा वाले शब्द
आम खा अपना काम कर
यह पढ़कर भी लगा था
की हम सीख रहे है
आ की मात्रा वाले शब्द
पर बात यह नहीं थी
बहुत बड़ा दर्शन छुपा था
इन नन्हे शब्दों में
अब समझ में आया
जब समय नहीं रहा
गुजार दी उम्र
खटपट करने में
आम खाने से
काम नहीं रखा
और अड़ाते रहे टांग
दूसरों के फटे में ........
अभय असि
नींबुओं का आचार
तुम अपने
नींबुओं का आचार
डाल लेते तो
काम आता आज
तुम्हारे बच्चों के
जो कुतर रहे है
कोरी रोटियां
और
तुम्हारा भी तो
वक्त बचता
जो तुमने बिगाड़ा
मेरे पतेली भर दूध को
फाड़ने में जीवन भर
तुम यह भूल गए की
मेरा दूध फटने से
कोई नुकसान नहीं
हो रहा था मेरा
क्योंकि वक्त ने मुझे
सीखा दिया था
फटे दूध से
रसगुल्ले बनाना
----असि----
बणजारा -
भाव की भेड़े
अरमानों के ऊँट
पालता चल
चलता चल
भटकन ही तेरा
है मुक्कदर
समझ जरा
गर ठौर ठिकाना
मिल जायगा
अरमानों के ऊँट
पालता चल
बणजारा हैं
तू जीवन का गीत
सुनाता चल
तू जीवन का गीत
सुनाता चल
मत तलाश
कोई ठौर ठिकाना
अपना घर
अपना घर
चलता चल
भटकन ही तेरा
है मुक्कदर
समझ जरा
गर ठौर ठिकाना
मिल जायगा
तेरा वजू़द
ही इस दुनियाँ से
हिल जाएगा
बिना भटके
बता कैसे बंजारा
कहलायेगा
ही इस दुनियाँ से
हिल जाएगा
बिना भटके
बता कैसे बंजारा
कहलायेगा
-असि बापू -
Wednesday, 24 September 2025
मैने देखा
दर्प अपना मैनें पिघलते देखा ।
साँझ सूरज जब डलते देखा ।
समय मल्ल ने सबको पछाड़ा
हिमालय को जब गलते देखा ।
राहे रुकती नहीं हैं अड़चनों से
घटा से चाँद जब निकलते देखा ।
रहा नहीं अभिमान काया का
मरघट में शव जब जलते देखा ।
लीला चितचोर की समझ आई
नन्हा बालक जब मचलते देखा ।
अभय 'असि'
Friday, 22 August 2025
आशाओं के धागें
एक दिन पिरोऊंगा
आशाओं के धागो में
मन में झंकृत शब्दों को
और बनाऊंगा माला
एक नई कविता की
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी
एक दिन सारी चिंताएं
कबाड़ बन खाने लगेगीं धूल
सारी उलझनें पड़ी होगी किसी कोने में ,
बुनकर के ताने बाने की तरह सुलझी हुई
और देखुंगा नन्ही तितली को उड़ते हुयें
घर की दहलीज से,
तो मन उन्मुक्त हो
उड़ने लगेगा मग्न मेघ सा
निश्चिन्ता के नभ में
तब लिखूंगा एक नई कविता
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी
और फिर तुम
किसी नदी किनारे
मेरे संग एकान्त में बैठकर
तय करना कि क्या
जीवन की यह कविता
सही लिखी या कहीं चूक हुई
चूक भी हुई हो तो भी तुम
वाह वाह, बहुत खूब या निशब्द
शब्दों का लगाना मरहम
जैसे लगाती आई हो अभी तक
तो मिलेगी मुझे थोड़ी सी हिम्मत
नये सृजन की
फिर लिखूंगा
एक नई कविता
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी ----- अभय असि
Thursday, 21 August 2025
जीवन मरु

बीत गया
दिन सारा
इस मरु को
पार करते करते
थका हूँ,नही हारा
आश्वस्त हूँ
की थम गये है
लू के थपेड़े
दिखा है
एक शीतल शाद्वल
सांझ ढलते ढलते
आंधी तुफानों से
सौगात में मिले
रेत कण
जो किरकरा रहें है
आखों में
दिन भर से
धो लूंगा शाद्वल के
शीतल जल से
अब सो सकूँगा
प्रगाढ़ निंद्रा में
इस मरु की
शांत शीतल
रात में
दिन तो सारा
बीत गया
इस मरु को
पार करते करते
अभय असि
Monday, 25 March 2019
ना जानें क्यों मुझे आज
तन्हा तन्हा सा लगता है ।।
इस भीड़ भरे माहोल में
सूना सूना सा लगता है ।।
अपनों के बीच होकर भी
पराया पराया लगता है ।।
चाँद तारों भरी रात में भी
अमा अमा सा लगता है ।।
देख आकाश की और कुछ
बतियाने का दिल करता है ।।
बन के बदरिया उसी के संग
उड़ जाने को दिल करता है ।।
अपनों को छोड परायों को
अपनाने का दिल करता है।।
यह रीत बनाने वालों को
गले लगाने को दिल करता है ।।
-------गोगी------
Tuesday, 6 November 2012
मासूम मन
तेरी माँ
तारा बन गई
मेरे मासूम मन में
ये बात नहीं आई |
माँ तारा
केसे बन सकती है !!!
शायद दुनिया
झूठ कहती है |
पर माँ जब
नहीं दिखती
घर मे,खेत मे ,
खलिहान मे, मंदर मे |
तो हो विवश
देखने लगती हू
तारा बन गई
मेरे मासूम मन में
ये बात नहीं आई |
माँ तारा
केसे बन सकती है !!!
शायद दुनिया
झूठ कहती है |
पर माँ जब
नहीं दिखती
घर मे,खेत मे ,
खलिहान मे, मंदर मे |
तो हो विवश
देखने लगती हू
गगन मे
जगमगाते तारो को
कोंनसी है मेरी माँ इनमे |
एक टिमटिमाता तारा
कुछ बोल रहा हो इशारे से
बस मे भी बाते करने लगती हू
तोतली जुबान मे |उस तारे से
और बस ऐसे ही
नींद लग जाती
और रात गुजर जाती
इस तरह
गुजर गयी कई राते
करते करते उस तारे से बाते|
और अब वो तारा ही
लगने लगा है मुझे मेरी माँ
शायद अब इस बात को
नहीं समझ पायेगा ये जहां
जिसने झूठ बोला था
मुझे समझाने के लिए
की तारा बन गयी तेरी माँ |
अब में भी
जानती हूँ की
नहीं है मेरी माँ
ये तारा
पर वो माँ से
कम भी तो नहीं
जिसके सहारे
कटा जीवन सारा
---- गोगी -----
कोंनसी है मेरी माँ इनमे |
एक टिमटिमाता तारा
कुछ बोल रहा हो इशारे से
बस मे भी बाते करने लगती हू
तोतली जुबान मे |उस तारे से
और बस ऐसे ही
नींद लग जाती
और रात गुजर जाती
इस तरह
गुजर गयी कई राते
करते करते उस तारे से बाते|
और अब वो तारा ही
लगने लगा है मुझे मेरी माँ
शायद अब इस बात को
नहीं समझ पायेगा ये जहां
जिसने झूठ बोला था
मुझे समझाने के लिए
की तारा बन गयी तेरी माँ |
अब में भी
जानती हूँ की
नहीं है मेरी माँ
ये तारा
पर वो माँ से
कम भी तो नहीं
जिसके सहारे
कटा जीवन सारा
---- गोगी -----Wednesday, 4 April 2012
पौधा सूख गया था
वो पौधा
सूख गया था,
माली भूल गया था
प्यार की फुहार
उस पर बरसाना |
भूल गया था
प्रेम से उसकी लताओं
को सहलाना |
भूल गया था
पशुओं से उसके
पत्ते,टहनियों को बचाना
माली की उपेक्षित भावनाओं से
उसका जीवन टूट गया था
वो पौधा सूख गया था |
अभय असि
Sunday, 18 March 2012
नादान परिंदा
नादान परिंदा
नादान परिंदा
उड़ना चाहता था
घोसला छोड़ कर
माँ उसे डरा देती थी
कमजोर पंखो का
उल्हाना देकर |
पर वह जिज्ञासु जब भी
घोसले से बाहर देखता
में भी उडू ,में भी उडू
माँ से पूछता फिरता
तू छोटा है ,नादान है
माँ उसे समझाती
पर उस जिज्ञासु को
माँ की बात
समझ में नही आती|
इस डाल से उस डाल उड़ता
जब जब भी माँ
दाना लेने जाती
उड़कर बहुत खुश होता
पर माँ से झूठ बोलने वाली
बात नहीं सुहाती
साथी परिंदों को उड़ता देख
खुद को रोक न पाया
और फिर वह भी
घोसले से बहार
निकल आया
पंख फडफडाये
उड़ान भरी और उड़ने लगा
उंचा ऊंचा और ऊंचा
आकाश की और
पलटकर नहीं देखा
उसने घोसले की और
पर माँ अभी भी देख रही थी
उसे घोंसले से उसे
आखिर माँ है
दिल में डर था
उसके गिरने का
---- गोगी -------
Saturday, 25 February 2012
याद आते है
सर्दी की सुहानी धूप और गांव की चौपाल ||
चौपाल पर बचपन के वो सारे बाल गोपाल ||
चौपाल पर बचपन के वो सारे बाल गोपाल ||
------------------------याद आते हैं ।।
जेठ की तपन, खेत और खेत की मेड़ ||
मेड़ पर शितल छाँव वाला आम का पेड़ ||
------------------------याद आते हैं।।
बारिश की पहली फुहार, गाँव का आँगन ।।
फुहार से निकलती सौंधी माटी की सुगंध ।।
------------------------याद आते हैं ।
बारिश में भीगना और वो थर थर कांपना ।।
लाड़ दुलार भरी डाँट और बाबा का डाँटना ।।
----------------------याद आते हैं।।
डाँट सुनकर आँखों में आँसुओं की धार ।।
माँ की उंगलियो का आँसू पोछता प्यार ।।
---------------------याद आते हैं ।।
......... गोगी ........
जेठ की तपन, खेत और खेत की मेड़ ||
मेड़ पर शितल छाँव वाला आम का पेड़ ||
------------------------याद आते हैं।।
बारिश की पहली फुहार, गाँव का आँगन ।।
फुहार से निकलती सौंधी माटी की सुगंध ।।
------------------------याद आते हैं ।
बारिश में भीगना और वो थर थर कांपना ।।
लाड़ दुलार भरी डाँट और बाबा का डाँटना ।।
----------------------याद आते हैं।।
डाँट सुनकर आँखों में आँसुओं की धार ।।
माँ की उंगलियो का आँसू पोछता प्यार ।।
---------------------याद आते हैं ।।
......... गोगी ........
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