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Wednesday, 24 September 2025

मैने देखा

दर्प अपना मैनें पिघलते देखा ।
साँझ सूरज जब डलते देखा । 

समय मल्ल ने सबको पछाड़ा  
हिमालय को जब गलते देखा । 

राहे रुकती नहीं हैं अड़चनों से 
घटा से चाँद जब निकलते देखा ।

रहा नहीं अभिमान काया का  
मरघट में शव जब जलते देखा । 

लीला चितचोर की समझ आई 
नन्हा बालक जब मचलते देखा । 
            अभय  'असि'

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