दर्प अपना मैनें पिघलते देखा ।
साँझ सूरज जब डलते देखा ।
समय मल्ल ने सबको पछाड़ा
हिमालय को जब गलते देखा ।
राहे रुकती नहीं हैं अड़चनों से
घटा से चाँद जब निकलते देखा ।
रहा नहीं अभिमान काया का
मरघट में शव जब जलते देखा ।
लीला चितचोर की समझ आई
नन्हा बालक जब मचलते देखा ।
अभय 'असि'
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