आपका हार्दिक स्वागत है

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Wednesday, 24 September 2025

मैने देखा

दर्प अपना मैनें पिघलते देखा ।
साँझ सूरज जब डलते देखा । 

समय मल्ल ने सबको पछाड़ा  
हिमालय को जब गलते देखा । 

राहे रुकती नहीं हैं अड़चनों से 
घटा से चाँद जब निकलते देखा ।

रहा नहीं अभिमान काया का  
मरघट में शव जब जलते देखा । 

लीला चितचोर की समझ आई 
नन्हा बालक जब मचलते देखा । 
            अभय  'असि'

Friday, 22 August 2025

आशाओं के धागें

एक दिन पिरोऊंगा 
आशाओं के धागो में 
मन में झंकृत शब्दों को
और बनाऊंगा माला 
एक नई कविता की 
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी 

एक दिन सारी चिंताएं  
कबाड़ बन खाने लगेगीं धूल
सारी उलझनें पड़ी होगी किसी कोने में , 
बुनकर के ताने बाने की तरह सुलझी हुई 
और देखुंगा नन्ही तितली को उड़ते हुयें 
घर की दहलीज से,
तो मन उन्मुक्त हो 
उड़ने लगेगा मग्न मेघ सा 
निश्चिन्ता के नभ में  
तब लिखूंगा एक नई कविता 
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी 

और फिर तुम 
किसी नदी किनारे
मेरे संग एकान्त में बैठकर
तय करना कि क्या
जीवन की यह कविता 
सही लिखी या कहीं चूक हुई 
चूक भी हुई हो तो भी तुम
वाह वाह, बहुत खूब या निशब्द 
शब्दों का लगाना मरहम 
जैसे लगाती आई हो अभी तक 
तो मिलेगी मुझे थोड़ी सी हिम्मत 
नये सृजन की 
फिर लिखूंगा 
एक नई कविता 
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी -----   अभय असि
    

Thursday, 21 August 2025

जीवन मरु

 
बीत गया
दिन सारा
इस मरु को
पार करते करते
थका हूँ,नही हारा
आश्वस्त हूँ
की थम गये है
लू के थपेड़े
दिखा है
एक शीतल शाद्वल
सांझ ढलते ढलते

आंधी तुफानों से
सौगात में मिले
रेत कण
जो किरकरा रहें है
आखों में
दिन भर से
धो लूंगा शाद्वल के
शीतल जल से

अब सो सकूँगा
प्रगाढ़ निंद्रा में
इस मरु की
शांत शीतल
रात में
दिन तो सारा

बीत गया
इस मरु को
पार करते करते

अभय असि

Monday, 25 March 2019


ना जानें क्यों मुझे आज 
तन्हा तन्हा सा लगता है ।। 
इस भीड़ भरे माहोल  में 
सूना सूना सा लगता है ।। 

अपनों के बीच होकर भी
पराया पराया  लगता है ।। 
चाँद तारों भरी रात में भी
अमा अमा सा लगता है  ।। 

देख आकाश की  और कुछ
बतियाने का दिल करता है ।। 
बन के बदरिया उसी के संग 
उड़ जाने को दिल करता है ।। 

अपनों को छोड परायों को 
अपनाने का दिल करता है।। 
यह  रीत बनाने वालों को
गले लगाने को दिल करता है ।। 
-------गोगी------ 

Tuesday, 6 November 2012

मासूम मन

तेरी माँ
तारा बन गई
मेरे मासूम मन में
ये बात नहीं आई |

माँ तारा
केसे बन सकती है !!!
शायद दुनिया
झूठ कहती है |

पर  माँ जब
नहीं दिखती
घर मे,खेत मे ,
खलिहान मे, मंदर मे |

तो हो विवश
देखने लगती हू 
गगन मे 
जगमगाते तारो को
कोंनसी है मेरी माँ इनमे |

एक टिमटिमाता तारा
कुछ बोल रहा हो इशारे  से
बस मे भी बाते करने लगती हू
 तोतली जुबान मे |उस तारे से

और बस ऐसे ही
नींद लग जाती
और रात गुजर जाती
इस तरह
गुजर गयी कई राते
करते करते उस तारे से बाते|

और अब वो तारा ही
लगने लगा है मुझे मेरी माँ
शायद अब इस बात को
नहीं समझ पायेगा ये जहां

जिसने झूठ बोला था
मुझे समझाने के लिए
की तारा बन गयी तेरी माँ |

अब में भी
जानती हूँ  की
नहीं है  मेरी माँ
ये तारा

पर वो  माँ से
कम भी तो नहीं
जिसके सहारे
कटा जीवन  सारा
---- गोगी  -----

Wednesday, 4 April 2012

पौधा सूख गया था


वो पौधा
सूख गया था,
माली भूल गया था
प्यार की फुहार
उस पर बरसाना |

भूल गया था
प्रेम से उसकी लताओं 
को सहलाना |

भूल गया था
पशुओं से उसके
पत्ते,टहनियों को बचाना 

माली की उपेक्षित भावनाओं से 
उसका जीवन टूट गया था
वो पौधा सूख गया था |
 
अभय  असि  




Sunday, 18 March 2012

नादान परिंदा

नादान परिंदा

नादान परिंदा
उड़ना चाहता था
घोसला छोड़ कर

माँ उसे डरा देती थी
कमजोर पंखो का
उल्हाना देकर |

पर वह जिज्ञासु जब भी
घोसले से बाहर देखता
में भी उडू ,में भी उडू
माँ से  पूछता फिरता

तू छोटा है ,नादान है
माँ उसे समझाती
पर उस जिज्ञासु को
माँ की बात
समझ में नही आती|
इस डाल से उस डाल उड़ता
जब जब भी माँ
दाना लेने जाती
उड़कर बहुत खुश होता
पर माँ से झूठ बोलने वाली
 बात नहीं सुहाती

साथी परिंदों को उड़ता देख
खुद को रोक न पाया
और फिर वह भी
घोसले से बहार
 निकल आया
पंख फडफडाये
उड़ान भरी और उड़ने लगा
उंचा ऊंचा और ऊंचा
आकाश की और
पलटकर नहीं देखा
उसने घोसले की और

पर माँ अभी भी  देख रही थी
उसे घोंसले  से उसे
आखिर माँ है
दिल में डर था
उसके  गिरने का
---- गोगी -------

Saturday, 25 February 2012

याद आते है

सर्दी की सुहानी धूप और गांव की चौपाल ||
चौपाल पर बचपन के वो सारे बाल गोपाल ||
------------------------याद आते हैं ।।

जेठ की तपन, खेत और खेत  की  मेड़ ||
मेड़ पर शितल छाँव वाला आम का पेड़ ||
------------------------याद आते हैं।।

बारिश की पहली फुहार, गाँव का आँगन ।।
फुहार से निकलती सौंधी माटी की सुगंध ।।
------------------------याद आते हैं ।

बारिश में भीगना और वो थर थर कांपना ।।
लाड़ दुलार भरी डाँट और बाबा का डाँटना ।।
----------------------याद आते हैं।।
डाँट सुनकर आँखों में आँसुओं की धार ।।
माँ की उंगलियो का आँसू पोछता प्यार ।।
---------------------याद आते हैं ।।
......... गोगी ........

Saturday, 4 February 2012

प्रार्थना जिन्दगी से

जिंदगी एक बार फिर
तुझे बुलाना चाहती हूँ
शिकायत नहीं हें तुझसे
पर जो छूट गया है न !
बस उसे जीना चाहती हूँ.
रह गए जो खिलोने अनछुए
उन खिलौनों का छूना चाहती हूँ .

वो गाँव, वो घर, वो पेड़ 
पेड़ पर वो सावन के झूले
वो बचपन वो सखियाँ साथी
जो बरसों से ना मिलें 
बहुत कुछ पाकर भी 
सब कुछ छूट गया
सावन के उन झुलौ पर
झुलना चाहती हूँ 

जिंदगी एक बार फिर
तुझे बुलाना चाहती हूँ 
------- गोगी--------