एक दिन पिरोऊंगा
आशाओं के धागो में
मन में झंकृत शब्दों को
और बनाऊंगा माला
एक नई कविता की
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी
एक दिन सारी चिंताएं
कबाड़ बन खाने लगेगीं धूल
सारी उलझनें पड़ी होगी किसी कोने में ,
बुनकर के ताने बाने की तरह सुलझी हुई
और देखुंगा नन्ही तितली को उड़ते हुयें
घर की दहलीज से,
तो मन उन्मुक्त हो
उड़ने लगेगा मग्न मेघ सा
निश्चिन्ता के नभ में
तब लिखूंगा एक नई कविता
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी
और फिर तुम
किसी नदी किनारे
मेरे संग एकान्त में बैठकर
तय करना कि क्या
जीवन की यह कविता
सही लिखी या कहीं चूक हुई
चूक भी हुई हो तो भी तुम
वाह वाह, बहुत खूब या निशब्द
शब्दों का लगाना मरहम
जैसे लगाती आई हो अभी तक
तो मिलेगी मुझे थोड़ी सी हिम्मत
नये सृजन की
फिर लिखूंगा
एक नई कविता
ढोल की थाप पर
झूमती थिरकती नर्तकी सी ----- अभय असि

No comments:
Post a Comment