दूर क्षितिज पर
जब ठहरती है नज़र
तो उठती है
मन में एक लहर
चंद प्रश्नों की
सुनामी बनकर।
मेरे बाद आने वाले
क्या देख पाएंगे
ये मंजर?
देख पाएंगे?
सागर के आँगन में
बालू का बिछौना
नील गगन में
बादलों से बना
ये खिलौना?
नदी की लहरों पर
हिरणी सी फुदकती
ये नन्ही सी नाव?
निहार सकेंगे वो भी
जो मैं निहार रहा हूँ
यही सोच-सोच मैं
अपने पद-चिह्न
छोड़े जा रहा हूँ।
क्या चल सकेंगे वो
मेरे बनाए पद-मार्गों पर?
क्या बचा पाएंगे वो
जल, जमीं और जंगल?
या कहीं विकास की सड़कों पर
दौड़ते मिटा देंगे
पुरखों की बनाई
ये पगडंडियाँ?
यही सोच खड़ा रह जाता हूँ
एक प्रश्न-चिह्न बनकर।
— Asi
No comments:
Post a Comment