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Friday, 22 May 2026

मकड़जाल



देखता हूँ
मकड़ी को
जब जाल
बुनते हुए
उसके बुने जाल में
कीट पतंगो को
फसते हूए
तब मैं
न तो कुछ सोचता हूँ
ना ही कुछ विचरता हूँ
जानता हूँ
कीट पतंगो की
इस अलौकिक
कला को
जो जरुरी है
उदार पोषण के लिए
और कर भी क्या सकते है
वो है भी तो बैचारे
बुद्धि विहीन
देखता हूँ
जब मानव को
जाल बुनते हुए
उसके बुने जाल में
मानवो को फसते हुए
तब सोचता हूँ और विचरता भी हूँ
बहुत कुछ हाँ बहुत कुछ
क्यो बुनता जाल मनुष्य
मनुष्य के लिये
नहीं सोच पाता
इस लौकिक चालाकी को
जो जरुरी नहीं मनुष्य को
उदार पोषण के लिए
और वो है भी तो नहीं
बुद्धिविहिन
सोचता हूँ बहुत कुछ
और सोचते सोचते
उलझ जाता हूँ
अपने ही विचारों के
मकड़जाल में
और हो जाता हूँ
कीट पतंगो की तरह
बुद्धिविहीन
,,,,,,अभय असि ,,

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